गोवंश तस्करी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, वाहन जब्ती को अवैध करार देकर सरकार पर लगाया जुर्माना
प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में गोवंश की तस्करी के मामलों में पकड़े जाने वाले वाहनों की जब्ती और राजसात की कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा निर्णय सुनाया है। अदालत ने वाहन जब्ती की कार्रवाई को पूरी तरह अवैध करार देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह वाहन मालिक को हर महीने 25 हजार रुपये के हिसाब से किराया (मुआवजा) अदा करे। हाईकोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला गोतस्करी के एक प्रकरण में बोलेरो पिकअप वाहन की जब्ती को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने सुनाया फैसला, मिर्जापुर के जिलाधिकारी और विंध्याचल मंडल के आयुक्त के जब्ती संबंधी आदेश किए रद्द
अपने इस फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि केवल कोरे अनुमान और शंका के आधार पर किसी भी नागरिक के वाहन को जब्त नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार की कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पूरा होना और ठोस साक्ष्यों का होना अनिवार्य है। इस संपूर्ण मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने ‘नेसर शाह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य’ के मामले में मिर्जापुर के जिलाधिकारी तथा विंध्याचल मंडल के आयुक्त द्वारा पारित वाहन जब्ती और उससे जुड़े पुनरीक्षण आदेशों को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
लालंगज थाना क्षेत्र का है मामला, 5 फरवरी 2025 को पुलिस ने बोलेरो पिकअप में मवेशी मिलने के बाद की थी जब्ती की कार्रवाई
अदालत ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया है कि जब्त की गई गाड़ी को तत्काल प्रभाव से उसके मालिक को रिलीज किया जाए। इसके साथ ही, जितने दिनों तक वाहन पुलिस या प्रशासन के कब्जे में रहा, उसकी अवधि के लिए हर महीने 25 हजार रुपये की दर से वाहन स्वामी को मुआवजा दिया जाए। यह पूरा मामला मिर्जापुर जिले के लालगंज थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। पुलिस ने 5 फरवरी 2025 को नेसर शाह की बोलेरो पिकअप (गाड़ी संख्या UP-65-DT-2650) को पकड़ा था। पुलिस पक्ष का यह दावा था कि उस वाहन में आठ बैल, एक गाय और एक बछड़ा समेत कुल दस मवेशियों को लादकर ले जाया जा रहा था।
बिहार ले जाकर वध करने का लगाया गया था आरोप, जिला प्रशासन और कमिश्नर कोर्ट ने बरकरार रखा था जब्ती का आदेश
पुलिस और प्रशासन की ओर से यह आरोप लगाया गया था कि इन पशुओं को पिकअप वाहन में भरकर वध (स्लाटरिंग) के उद्देश्य से अवैध रूप से बिहार राज्य भेजा जा रहा था। इस सिलसिले में गोवध निवारण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके बाद मिर्जापुर के जिलाधिकारी ने 19 मई 2025 को उक्त वाहन को राज्य सरकार के पक्ष में जब्त करने का आदेश पारित किया था। बाद में विंध्याचल मंडल के आयुक्त ने भी 21 मई 2026 को वाहन मालिक की पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए जब्ती के आदेश को यथावत बनाए रखा था।
अदालत ने पाया कि पशु स्वस्थ थे और यूपी के भीतर परिवहन के लिए परमिट की अनिवार्यता नहीं, केवल आशंका पर नहीं हो सकती कार्रवाई
मामले की न्यायिक समीक्षा के दौरान अदालत के संज्ञान में यह तथ्य आया कि पकड़े गए पशुओं की विधिवत पशु चिकित्सा अधिकारी (वेटरनरी ऑफिसर) से जांच कराई गई थी और वे पूरी तरह स्वस्थ पाए गए थे। जांच में वाहन से न तो किसी प्रकार का गोमांस बरामद हुआ और न ही वध किए गए पशुओं के कोई अवशेष मिले। अदालत ने स्पष्ट कानून की व्याख्या करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश की भौगोलिक सीमा के भीतर गाय और उसकी संतान के परिवहन के लिए किसी भी तरह के परमिट की आवश्यकता नहीं होती है। परमिट की अनिवार्यता कानूनन तभी लागू होती है, जब पशुओं को उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा से बाहर अन्यत्र ले जाया जा रहा हो।