बाल श्रम पर राष्ट्रीय राजधानी में गहन चर्चा, विशेषज्ञों ने कहा—गरीबी, प्रवास और स्कूल छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति से बच्चे श्रम की ओर धकेले जा रहे

नई दिल्ली, 13 मार्च : राष्ट्रीय राजधानी में बाल श्रम की स्थिति की समीक्षा करने और इसकी रोकथाम, बचाव तथा पुनर्वास के लिए बेहतर समन्वय के उपायों पर चर्चा करने के उद्देश्य से “बाल श्रम मुक्त दिल्ली की ओर” विषय पर राज्य स्तरीय परामर्श बैठक आयोजित की गई। बैठक में सरकारी प्रतिनिधियों, बाल संरक्षण संस्थानों, नागरिक समाज संगठनों और नीति विशेषज्ञों ने भाग लिया।

यह परामर्श बैठक पहल संगठन द्वारा आयोजित की गई, जिसमें क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) और फॉरेस्टर ज्ञान साझेदार के रूप में शामिल रहे। कार्यक्रम का आयोजन कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में किया गया। संवाद के दौरान विभिन्न सरकारी विभागों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, शिक्षा विभाग, बाल संरक्षण संस्थानों, शोधकर्ताओं और सामुदायिक प्रतिनिधियों ने शहर में बाल श्रम की समस्या से जुड़ी व्यवस्थाओं की कमियों और संभावित समाधान पर चर्चा की।

दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024–25 के दौरान दिल्ली में 2,588 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया। इसके बावजूद कई बच्चे घरेलू काम, ढाबों, निर्माण स्थलों, छोटे विनिर्माण और कढ़ाई-कारीगरी इकाइयों, कचरा छंटाई तथा सड़क पर सामान बेचने जैसे कार्यों में लगे पाए जाते हैं, जो उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और समग्र विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि दिल्ली में बाल श्रम का संबंध प्रवास, गरीबी, स्कूल से बाहर होना और तस्करी जैसे कारकों से गहराई से जुड़ा है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर प्रवासी परिवारों के बच्चे अनौपचारिक श्रम बाजार में शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

चर्चा के दौरान यह भी बताया गया कि स्कूल छोड़ने और बाल श्रम के बीच गहरा संबंध है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा मौलिक अधिकार है, फिर भी शहरी वंचित बस्तियों में विशेष रूप से उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर चिंता का विषय बनी हुई है।

हालांकि बाल एवं किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 2016 बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाने और किशोर श्रम को विनियमित करने का स्पष्ट कानूनी ढांचा प्रदान करता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियां सामने आती हैं। पुनर्वास की व्यवस्थाओं में असमानता, मुआवजा प्रक्रिया में देरी तथा श्रम, शिक्षा और बाल संरक्षण से जुड़े विभागों के बीच समन्वय की कमी जैसी समस्याओं पर भी चर्चा की गई।

पहल के महासचिव डॉ. जितेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि बाल श्रम जैसी समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब समुदायों की सक्रिय भागीदारी और जमीनी स्तर पर सामुदायिक जुड़ाव को मजबूत किया जाए। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के मंच सभी हितधारकों को एक साथ लाकर वर्तमान स्थिति की सामूहिक समीक्षा और सहयोगात्मक समाधान विकसित करने का अवसर प्रदान करते हैं।

कार्यक्रम में उत्तर भारत में क्राई की प्रोग्राम हेड जया सिंह ने कहा कि दिल्ली जैसे शहरी क्षेत्रों में बाल श्रम को अलग-थलग समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह प्रवास, गरीबी, स्कूल से बाहर होना और कमजोर सामाजिक सुरक्षा तंत्र जैसे कई सामाजिक-आर्थिक कारकों से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने रोकथाम, दीर्घकालिक पुनर्वास, शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यक्रम में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति के. जी. बालाकृष्णन की उपस्थिति भी रही। उन्होंने संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करने और बच्चों के अधिकारों व गरिमा की रक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

परामर्श में शामिल प्रतिनिधियों ने सहमति व्यक्त की कि सरकारी एजेंसियों, नागरिक समाज संगठनों और समुदायों के बीच निरंतर सहयोग से ही दिल्ली को बाल श्रम मुक्त बनाने की दिशा में प्रभावी और समन्वित कार्ययोजना तैयार की जा सकती है।

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Pradesh Samna
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