Khairagarh Land Dispute: खैरागढ़ का ऐतिहासिक एडवर्ड पार्क विवाद; 40 करोड़ की सरकारी जमीन पर निजी मालिकाना हक का दावा

छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ शहर की बहुचर्चित एडवर्ड चिल्ड्रेन पार्क और नजूल (सरकारी) भूमि को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी व प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है. लगभग 52 साल पहले हुई एक जमीन की रजिस्ट्री को आधार बनाकर करोड़ों रुपये की इस बेशकीमती जमीन पर निजी मालिकाना हक का दावा पेश किया जा रहा है. हालांकि, निजी स्वामित्व के इन दावों के बिल्कुल उलट सरकारी राजस्व और नजूल अभिलेखों में यही भूमि आज भी बच्चों के पार्क, घास भूमि, छोटे झाड़ के जंगल और सार्वजनिक उपयोग की जमीन के रूप में दर्ज है. जिस विवादित जमीन को लेकर यह पूरा घमासान मचा है, वह करीब 85 हजार स्क्वायर फीट एरिया में फैली है, जिसकी वर्तमान बाजार कीमत करीब 40 करोड़ रुपये आंकी जा रही है.

📜 क्या है खैरागढ़ का एडवर्ड पार्क विवाद? 1974 के दस्तावेजों का सच

राजस्व विभाग के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, साल 1974 में दो प्रमुख प्लॉट, जिनका नंबर 114 और 115 है, उनकी रजिस्ट्री स्मृति सिंह के नाम पर कराई गई थी. उस वक्त भी सरकारी कागजों में इन दोनों प्लॉटों को स्पष्ट रूप से ‘एडवर्ड पार्क’ और ‘बाड़ी एडवर्ड पार्क’ के रूप में रिकॉर्ड में दर्ज किया गया था. सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, खैरागढ़ रियासत के तत्कालीन राजा रहे वीरेंद्र बहादुर सिंह का नाम इस रजिस्ट्री में विक्रेता यानी जमीन बेचने वाले के रूप में दर्ज है, जो इस विवाद को राजपरिवार की संपत्ति से जोड़ता है.

❓ 40 करोड़ की जमीन पर कौन कर रहा है दावा? भूमि उपयोग बदलने पर खड़े हुए सवाल

दरअसल, विवाद की मुख्य शुरुआत यहां से होती है कि इस पुरानी रजिस्ट्री में शामिल जिन लोगों के नाम दर्ज हैं, उनमें से ज्यादातर लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजपरिवार से ताल्लुक रखते हैं. इस पूरे मामले पर सवाल इसलिए भी खड़े हो रहे हैं कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में यह पूरी भूमि पहले से ही सार्वजनिक उपयोग और चिल्ड्रेन पार्क के रूप में आरक्षित थी, तो फिर इसका ‘भूमि उपयोग’ (Land Use) में परिवर्तन कब हुआ, किसने किया और किस कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया? एसडीएम टंकेश्वर साहू का कहना है कि इसी रहस्यमयी प्रक्रिया के बीच इस पूरी भूमि को 22 छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर व्यावसायिक प्लाटिंग की तैयारी शुरू कर दी गई.

🕒 साल 2020 में पूर्व राजा देवव्रत सिंह ने उठाया था मुद्दा, भू-स्वामी पक्ष ने दी सफाई

बता दें कि साल 2020 में खैरागढ़ के तत्कालीन विधायक और राजा रहे स्वर्गीय देवव्रत सिंह ने अपने विधानसभा क्षेत्र में हो रही इस अवैध प्लाटिंग के मुद्दे को विधानसभा और प्रशासन के सामने प्रमुखता से उठाया था, जिसके बाद से इसकी आधिकारिक जांच प्रक्रिया शुरू हुई. दूसरी ओर, भूमि स्वामी पक्ष के प्रतिनिधि रजत भार्गव ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, “उनके पास वर्ष 1974 की विधिवत पंजीकृत रजिस्ट्री, सरकारी सीमांकन प्रतिवेदन और वैध राजस्व अभिलेख मौजूद हैं. उनके अनुसार यह भूमि सालों से उनकी पत्नी स्मृति भार्गव के नाम पर सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है, जिसका समय-समय पर नियमानुसार सीमांकन भी कराया गया है. शासन या प्रशासन यदि किसी प्रकार की जानकारी मांगता है, तो सभी वैध दस्तावेज सामने रखे जाएंगे. बिना संपूर्ण रिकॉर्ड और तथ्यों की बारीकी से जांच किए किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना ठीक नहीं होगा.”

⚖️ नियमों के उल्लंघन पर होगी सख्त कार्रवाई, नजूल विभाग को सौंपी गई रिपोर्ट: एसडीएम

पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए खैरागढ़ के एसडीएम (SDM) टंकेश्वर प्रसाद साहू ने बताया, “एक स्थानीय पत्रकार के द्वारा इस संबंध में लिखित शिकायत दी गई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि एडवर्ड पार्क की संरक्षित भूमि पर अवैध प्लाटिंग की जा रही है. हमने दी गई शिकायत को पूरी गंभीरता से संज्ञान में लेते हुए आरआई (RI) और पटवारी को मौके की जांच के निर्देश दिए थे. जांच दल द्वारा सौंपी गई सूचना में बताया गया है कि जमीन को अवैध रूप से 22 भागों में बांटा गया है और जो प्रॉपर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग का ले-आउट किसी जमीन के लिए अनिवार्य होना चाहिए, उस ले-आउट पर काम नहीं हुआ है. हमारे पास जो दो अलग-अलग जांच रिपोर्ट आई हैं, उन्हें संकलित कर हमने अंतिम निर्णय के लिए नजूल विभाग को अग्रसारित कर दिया है. जो भी कानूनन उचित होगा, वह सख्त कार्रवाई की जाएगी.” एसडीएम ने आगे कहा कि नियमों के मुताबिक जल्द ही अखबार में सार्वजनिक सूचना (पब्लिक नोटिस) जारी कर आम जनता से भी इस संबंध में दावे-आपत्तियां मांगी जाएंगी.

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