Delhi Voter List SIR Update: फॉर्म-6 और फॉर्म-8 के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने ECI से पूछा सवाल, लाखों मतदाताओं के नाम हटाने पर चिंता
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ यानी एसआईआर (SIR) की पूरी प्रक्रिया को कानूनी चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका पर बुधवार को देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने इस दौरान चुनाव आयोग से कड़े शब्दों में यह सवाल पूछा है कि जिन मतदाताओं ने दिल्ली एसआईआर के दौरान अपने गणना फॉर्म नहीं भरे थे, आखिर उन नागरिकों से नए वोटर के रूप में पंजीकरण के लिए ‘फॉर्म-6’ भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है, जबकि वे लोग पहले से ही वर्ष 2026 की अधिकृत मतदाता सूची में शामिल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर विसंगति पर संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग को दो सप्ताह के भीतर अपना स्पष्ट जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं। गौरतलब है कि यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब लगभग 43 लाख नागरिकों को ‘स्थान परिवर्तन’ या ‘अनुपस्थित’ श्रेणी में रखकर नई ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: ‘फॉर्म-6 पहली बार के मतदाताओं के लिए है, पहले से दर्ज वोटर करें फॉर्म-8 का उपयोग’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘फॉर्म-6’ का इस्तेमाल केवल उन नए नागरिकों द्वारा किया जाना चाहिए जो पहली बार अपना वोट बनवाने जा रहे हैं। जो लोग पहले से ही वर्ष 2026 की मतदाता सूची में बतौर वोटर पंजीकृत हैं और केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिफ्ट हुए हैं, उन्हें नियमानुसार ‘फॉर्म-8’ का उपयोग करने की अनुमति मिलनी चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि ऐसे पुराने मतदाताओं से यह घोषणा करने के लिए क्यों बाध्य किया जाए कि वे पूर्व में कभी भी मतदाता सूची का हिस्सा नहीं रहे हैं। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि थोड़े समय के लिए घर से बाहर रहना या अस्थायी रूप से दूसरी जगह निवास करना स्थायी रूप से स्थान बदलना नहीं कहलाता है। आजीविका या काम के सिलसिले में एक-दो महीने के लिए कहीं अन्यत्र रहने से कोई भी मतदाता अपने स्थायी निवास से विस्थापित नहीं हो जाता।
जस्टिस बागची ने उठाया बड़ा सवाल, कहा- क्या फॉर्म न भर पाने पर हमेशा के लिए छिन जाएगा वोट देने का अधिकार?
मामلا की सुनवाई कर रहे जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने चुनाव आयोग से सीधा सवाल किया कि क्या कोई ऐसा मतदाता, जो किसी कारणवश अपना गणना फॉर्म समय पर नहीं भर पाया, वह हमेशा-हमेशा के लिए अपने मताधिकार जैसे अमूल्य अधिकार से वंचित हो जाएगा? अदालत ने इसे एक स्पष्ट संरचनात्मक विसंगति करार दिया है, जिसे तुरंत दुरुस्त किए जाने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन नहीं हो जाता, तब केवल इस तकनीकी आधार पर किसी भी फॉर्म को खारिज कर देना पूरी तरह तर्कहीन है कि उसकी निर्धारित समय-सीमा निकल चुकी है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग ने अदालत को आश्वस्त किया कि वह विलंब से प्राप्त होने वाले पंजीकरण फॉर्मों को स्वीकार करने पर सकारात्मक रूप से विचार कर रहा है और यदि आवश्यकता पड़ी तो 30 अक्टूबर की तय समय-सीमा को भी आगे बढ़ा दिया जाएगा।
बिहार एसआईआर मामले पर कोर्ट ने स्पष्ट की स्थिति, कहा- हमने तार्किक विसंगति के मुद्दे पर नहीं दिया था कोई अंतिम फैसला
दिल्ली एसआईआर प्रकरण की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने कहा, ‘बिहार एसआईआर मामले में हमने तार्किक विसंगति (Logical Discrepancy) के मुख्य मुद्दे पर किसी तरह का कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया था और पश्चिम बंगाल के संदर्भ में इसे केवल एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में अनुमति दी गई थी।’ बेंच ने स्पष्ट किया कि लोग अक्सर बिहार वाले आदेश का हवाला देकर यह दावा करते हैं कि सब कुछ पहले से ही तय हो चुका है, जबकि ऐसा नहीं है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट ने तार्किक विसंगति श्रेणी को किसी ठोस मिसाल के रूप में मान्यता नहीं दी है।