डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में दी डेटा प्रोटेक्शन एक्ट को चुनौती, पत्रकारिता पर खतरे की आशंका

नई दिल्ली: देश के 21 प्रमुख डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिष्ठित संगठन डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट’ (DPDP Act) को आधिकारिक रूप से चुनौती दी है। संगठन की ओर से यह मजबूत तर्क रखा गया है कि इस नए कानून के दायरे में पत्रकारिता और मीडिया गतिविधियों के लिए किसी भी प्रकार की स्पष्ट छूट का प्रावधान न होने के कारण भविष्य में खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) और गोपनीय सूत्रों (Confidential Sources) की सुरक्षा पर बहुत बड़ा संकट पैदा हो सकता है। जानकारी के अनुसार, इस कानून के कई बेहद सख्त और कड़े प्रावधान आगामी मई 2027 से पूरी तरह लागू होने जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और आईटी मंत्रालय से मांगा जवाब, अंतरिम रोक से इनकार

इस महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को नोटिस जारी कर उनसे औपचारिक जवाब तलब किया है। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने फिलहाल केंद्र सरकार का पक्ष सुने बिना इस कानून के क्रियान्वयन पर किसी भी प्रकार की अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई अब आगामी 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है। इस याचिका को दायर करने वाले देश के 21 प्रमुख समाचार प्रकाशकों और मीडिया समूहों में मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह के स्वामित्व वाली नेटवर्क18, गौतम अडानी समूह के अधीन आने वाली एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट, द हिंदू, इंडिया टुडे, जी मीडिया और एबीपी नेटवर्क जैसे तमाम दिग्गज मीडिया संस्थान शामिल हैं।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता और खोजी रिपोर्टिंग प्रभावित होने की जताई गई गहरी आशंका

DNPA का मुख्य रूप से यह कहना है कि इस कानून के भीतर पत्रकारिता और समाचार संकलन के कार्यों के लिए स्पष्ट छूट न दिए जाने की वजह से खोजी पत्रकारिता और जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दों को उजागर करने में बड़ी कानूनी बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से जुड़े नोटिस भेजने, पूर्व सहमति लेने और डेटा को डिलीट करने जैसे कड़े प्रावधानों के कारण पत्रकारों को अक्सर ऐसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, जहां उन्हें जांच के दायरे में आए किसी प्रभावशाली व्यक्ति या आरोपी से अनुमति लेनी पड़े अथवा पहले से प्रकाशित की जा चुकी खबरों को अपनी वेबसाइट्स से हटाना पड़ जाए। एसोसिएशन ने यह भी बड़ी आशंका जताई है कि सरकार को डेटा से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां मांगने की अत्यधिक और व्यापक शक्तियां मिलने की स्थिति में पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान सार्वजनिक हो सकती है। इससे भ्रष्टाचार, घोटालों और अन्य प्रशासनिक अनियमितताओं का पर्दाफाश करने वाले व्हिसलब्लोअर या अन्य स्रोतों के पत्रकारों तक जानकारी पहुंचाने के साहस पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक

एसोसिएशन की तरफ से अदालत में पैरवी कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अपनी दलील रखते हुए कहा कि पत्रकारिता को स्पष्ट छूट न देना सीधे तौर पर प्रेस की स्वतंत्रता पर पूर्व-नियंत्रण (Prior Restraint) जैसी खतरनाक स्थिति पैदा कर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी खबर को सार्वजनिक करने या छापने से ठीक पहले संबंधित व्यक्ति से उसकी सहमति लेने की कानूनी बाध्यता देश के किसी भी न्यूज रूम के सुचारू और स्वतंत्र कामकाज को पूरी तरह बाधित कर देगी। इस पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया संस्थानों को व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग और आम नागरिकों की निजता को सुरक्षित रखने के प्रभावी उपाय भी खुद ही सुझाने चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि देश के आम और निर्दोष नागरिकों के भी अपने मौलिक अधिकार हैं, इसलिए नागरिकों की निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच एक उचित संतुलन स्थापित किया जाना बेहद आवश्यक है।

केंद्र सरकार को जारी हुआ नोटिस, 17 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से मांगी गई अंतरिम रोक की मांग पर फिलहाल केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का समय दिया है। अब इस पूरे प्रकरण पर आगे की विस्तृत सुनवाई 17 नवंबर को तय की गई है, जिसमें देश के इस नए डेटा संरक्षण कानून के विभिन्न प्रावधानों और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े तमाम कानूनी सवालों पर अदालत गहराई से विचार करेगी।

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