Bengal Election: बंगाल चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी- भारत में जन्मे हर व्यक्ति को वोट का अधिकार, चुनाव नतीजों पर भी कही ये बात

उन्होंने यह भी कहा, “यह राष्ट्रीयता और देशभक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति भी है कि आप एक लोकतांत्रिक सरकार चुनने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं. यह एक ऐसा विषय है जिस पर हमें गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.” जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि ओरिजलन SIR प्रक्रिया में साल 2002 की वोटर लिस्ट में शामिल लोगों की दोबारा जांच करने का कोई प्रावधान नहीं था.

जज ने इस सवाल पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया कि क्या भारत में अवैध प्रवासियों से जन्मे बच्चों को भी, आम नागरिकों से जन्मे बच्चों की तरह, वोट देने का अधिकार दिया जाएगा. हालांकि, बेंच ने उन लोगों को वोट देने की इजाजत देने वाली याचिका को खारिज कर दिया, जिन्हें अपीलीय न्यायाधिकरणों की ओर से वोट डालने के लिए पात्र घोषित किया गया था.

… तो हम इस केस पर पुनर्विचार करेंगे: SC

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने कहा कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया में कुछ भी असामान्य नहीं किया जा रहा है, क्योंकि वोटर्स को लिस्ट से हटाने की दर (Deletion Rate) अन्य राज्यों की वोटर लिस्ट से हटाए गए वोटर्स के प्रतिशत के आंकड़ों के लगभग बराबर ही है.

इस मसले पर बहस तब शुरू हुई जब सीनियर एडवोकेट रऊफ रहीम ने यह दलील दी कि जिन लोगों को अपीलीय न्यायाधिकरणों की ओर से वोटिंग के लिए पात्र घोषित किया गया है, उन्हें वोटर लिस्ट के ‘फ्रीज़’ होने के बावजूद वोट देने की अनुमति दी जानी चाहिए. जस्टिस बागची ने कहा, “हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बंगाल इस मामले में सबसे अलग है या SIR की सामान्य प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है. लेकिन ‘तार्किक विसंगति’ (Logical discrepancy) की श्रेणी अन्य राज्यों में देखने को नहीं मिली है. जांच-पड़ताल के दौरान उचित मामलों में सुनवाई की सुविधा उपलब्ध होती है, लेकिन न्यायिक अधिकारियों द्वारा की गई जांच के दौरान यह सुविधा नहीं दी गई. इसका मुख्य कारण काम का अधिक बोझ और चुनावों की करीब होना रहा.”

जस्टिस बागची ने कहा कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में 10% वोटर्स को वोटर लिस्ट से हटा दिया जाता है, और वहां हार- जीत का अंतर 15% या उससे अधिक का रहता है, तो चुनाव परिणाम को सही और वैध माना जाएगा. उन्होंने यह भी कहा, “यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में जीत का अंतर महज 2 फीसदी है और वोटर्स को वोटर लिस्ट से हटाने की दर 10 फीसदी है, तो हम ऐसे मामलों पर विशेष रूप से विचार करेंगे.”

उन्होंने आगे कहा, “अगर चुनाव आयोग के SIR पर बने मूल SOP पर गौर करें, तो 2002 की वोटर लिस्ट में शामिल लोगों का कोई सवाल ही नहीं था. लेकिन अब आपने उन मामलों की जांच की है, जिनमें फॉर्म में भरी गई पहचान 2002 की वोटर लिस्ट के नामों से मेल नहीं खाया. इसीलिए हमने अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल किया और दावों, आपत्तियों और साथ में लगे दस्तावेजों की जांच के भारी-भरकम काम के लिए अपने न्यायिक अधिकारियों को लगाया.”

अपीलीय फोरम को अपना काम करने दीजिएः SC

जज ने आगे कहा, “हम इस प्रक्रिया में जल्दबाजी नहीं कर सकते. इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने एक विस्तृत अपीलीय फोरम बनाया, जो एक निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करना चाहता था, जिसका मकसद वोटर लिस्ट को बढ़ाना या घटाना नहीं था. अब तक 34 लाख से अधिक अपीलें दाखिल की जा चुकी हैं.”

इस दौरान नायडू ने कहा कि जांच के लिए पर्याप्त संख्या में हाई रैंक के अफसरों को तैनात करने में राज्य की नाकामी की वजह से देरी हुई, तो जस्टिस बागची ने कहा, “यह राज्य और चुनाव आयोग के बीच की लड़ाई नहीं है. यह एक-दूसरे पर दोष मढ़ने का खेल नहीं है. यह उन वोटर्स का सवाल है, जो संवैधानिक संस्थाओं के बीच पिस रहे हैं. आयोग के नज़रिए से, उसने अपना सबसे अच्छा प्रयास किया है. जबकि राज्य अलर्ट है. ऐसी स्थिति में, अदालत का मकसद सुविधा देने वाले का है, न कि यह तय करना कि कौन सही है और कौन गलत.”

बिना आदेश अधिकारियों की सुरक्षा न हटाई जाएः SC

CJI सूर्यकांत ने यह कहते हुए बहस खत्म कर दी कि इस समय किसी भी अकादमिक कवायद की कोई जरूरत नहीं है. अपने आदेश में, बेंच ने यह भी कहा, “हम अपीलों पर फैसला आने से पहले, शामिल किए जाने की किसी भी अर्जी पर विचार नहीं करेंगे. ट्रिब्यूनल को दाखिल की गई अपीलों पर फैसला करने दें, और हम आगे की कार्रवाई तय करेंगे.” 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल ने कल सोमवार से पूरी क्षमता से काम करना शुरू कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार से यह भी कहा कि वे SIR के काम में हिस्सा लेने वाले पश्चिम बंगाल के न्यायिक अधिकारियों को राज्य पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के ज़रिए सुरक्षा देना जारी रखें. बेंच ने हिदायत देते हुए कहा, “उनकी सुरक्षा सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बगैर नहीं हटाई जाएगी.” साथ ही यह भी कहा कि सुरक्षा खतरों का आकलन करने के बाद इसे आगे बढ़ाया भी जा सकता है.

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Pradesh Samna
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