Bijapur Water Crisis: बीजापुर के कौशलनार गांव में गहराया पेयजल संकट, नाले का दूषित पानी पीने को मजबूर ग्रामीण
भैरमगढ़ ब्लॉक अंतर्गत स्थित कौशलनार गांव भले ही अब नक्सल प्रभाव से पूरी तरह बाहर आ चुका हो, लेकिन आज भी यहां के स्थानीय ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के कड़े अभाव में अत्यंत कठिन जीवन जीने को मजबूर हैं. गांव की इस समय सबसे बड़ी और संवेदनशील समस्या पेयजल (पीने के पानी) को लेकर सामने आ रही है, जहां लोग साफ पानी के लिए रोजाना कड़ा संघर्ष कर रहे हैं. जमीनी हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीणों को नाले के किनारे रेत हटाकर (चुआं खोदकर) रिसने वाले गंदे पानी को अपनी प्यास बुझाने के लिए इस्तेमाल करना पड़ रहा है.
💧 गांव में 50 से अधिक परिवार, गर्मी बढ़ते ही दम तोड़ गए सभी हैंडपंप
इस सुदूर ग्रामीण इलाके में लगभग 50 से अधिक परिवार निवास करते हैं. भीषण गर्मी बढ़ने के साथ ही गांव में स्थापित सभी हैंडपंप और दूसरे पारंपरिक जल स्रोत लगभग पूरी तरह से सूख चुके हैं. ऐसे में ग्रामीणों के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है. ग्रामीण सुबह-सुबह खाली बर्तन लेकर नाले के पास पहुंचते हैं और रेत हटाकर धीरे-धीरे इकट्ठा होने वाले मटमैले पानी को छानकर अपने घरों को ले जाते हैं. यह पूरी प्रक्रिया न केवल बेहद थकाऊ और समय लेने वाली है, बल्कि ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर खतरा बन चुकी है.
🐄 मवेशी और इंसान एक ही जल स्रोत से प्यास बुझाने को मजबूर, बीमारियों का खतरा
कौशलनार गांव में शुद्ध पीने के पानी की फिलहाल कोई वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है. लिहाजा, मजबूरी में जिस जल स्रोत या नाले से ग्रामीण पानी भरते हैं, ठीक उसी जगह से क्षेत्र के मवेशी भी अपनी प्यास बुझाते हैं. यानी एक ही असुरक्षित जगह का दूषित पानी मवेशी और इंसान दोनों ही पी रहे हैं. खुले नाले के इस पानी के उपयोग के कारण ग्रामीणों में गंभीर पेट जनित संक्रमण, डायरिया और अन्य जलजनित महामारियों का खतरा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है.
🛠️ पाइपलाइन और नई टंकी से ही संभव है इस बड़ी समस्या का स्थायी समाधान
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि गांव में सौर ऊर्जा आधारित जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन, पानी टंकी या नए गहरे हैंडपंपों की अविलंब व्यवस्था करके ही इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है. कौशलनार जैसे सुदूर गांवों की यह जमीनी हकीकत विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों की उस तस्वीर को दर्शाती है, जहां लोग आज भी 21वीं सदी में बुनियादी आजीविका और रोजमर्रा की न्यूनतम जरूरतों के लिए प्रकृति के भरोसे संघर्ष कर रहे हैं.