बरेली सेंट्रल जेल की दीवारों में दर्ज है स्वाधीनता संग्राम का गौरवशाली इतिहास, अंग्रेजों को होना पड़ा था नतमस्तक
बरेली (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित सेंट्रल जेल केवल एक प्रशासनिक इमारत नहीं है, अपितु इसकी दीवारों में भारत के स्वतंत्रता संग्राम का वह पावन इतिहास दर्ज है, जिसे स्मरण करते ही भारत मां के वीर सपूतों के साहस और बलिदान का चित्रण जीवंत हो उठता है।
ब्रिटिश हुकूमत के दौर में इसी कारागार की सलाखों के पीछे निरुद्ध स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने अधिकारों और मान-सम्मान हेतु बुलंद आवाज उठाई थी तथा अनेक अवसरों पर क्रूर अंग्रेज अफसरों को अपनी मांगों के समक्ष झुकने पर विवश कर दिया था। आजादी के 79 वर्ष बाद भी बरेली सेंट्रल जेल से जुड़ी क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं उस दौर की स्वर्णिम याद दिलाती हैं, जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण 1929 की वह ऐतिहासिक 53 दिवसीय भूख हड़ताल है जिसने अंग्रेजी शासन की नींव हिलाकर रख दी थी।
⛓️ काकोरी कांड के सजायाफ्ता क्रांतिकारियों ने उठाई थी आवाज, जेल में शुरू की अभूतपूर्व भूख हड़ताल
सितंबर 1929 में ऐतिहासिक काकोरी कांड के सजायाफ्ता महान स्वतंत्रता सेनानियों—मन्मथनाथ गुप्त, राजकुमार सिन्हा, मुकुंदीलाल तथा शचींद्रनाथ बख्शी को स्थानांतरित कर बरेली सेंट्रल जेल लाया गया था।
जेल पहुंचते ही उन्होंने राजनीतिक बंदियों के साथ किए जाने वाले अमानवीय व्यवहार, दूषित भोजन तथा मूलभूत सुविधाओं के अभाव के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की। क्रांतिकारियों की स्पष्ट मांग थी कि राजनीतिक बंदियों को सामान्य अपराधियों से पृथक रखा जाए, उन्हें गरिमापूर्ण भोजन दिया जाए, अमानवीय कठोर श्रम न कराया जाए तथा अध्ययन-लेखन की सुविधाएं प्रदान की जाएं। जब जेल प्रशासन ने उनकी जायज मांगों को अनसुना कर दिया, तो इन वीर सपूतों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल प्रारंभ कर दी। अंग्रेज अधिकारियों के भीषण दबाव और प्रताड़ना के बावजूद क्रांतिकारी अपने संकल्प पर अडिग रहे और यह हड़ताल 53 दिनों तक जारी रही।
📨 शहीद-ए-आजम भगत सिंह तक पहुंचा था संदेश, अंग्रेजों को टेलीग्राम भिजवाकर मांगनी पड़ी थी मदद
बरेली जेल में जारी इस ऐतिहासिक भूख हड़ताल की गूंज जब कारागार की चहारदीवारी से बाहर निकली, तो संपूर्ण देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई।
लाहौर सेंट्रल जेल में बंद शहीद-ए-आजम भगत सिंह तक जब यह समाचार पहुंचा, तो उन्होंने भी क्रांतिकारियों से स्वास्थ्य के दृष्टिगत भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह किया। किंतु बरेली जेल में बंद स्वाधीनता सेनानी अपनी मांगों पर पूर्ण अमल होने तक पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। बंदियों की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और जन-आक्रोश को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत को भगत सिंह के माध्यम से टेलीग्राम भिजवाकर मध्यस्थता की गुहार लगानी पड़ी। अंततः 53वें दिन ब्रिटिश जेल प्रशासन को क्रांतिकारियों की सभी मांगों के सामने झुकना पड़ा और हड़ताल समाप्त हुई। यह घटना इतिहास के पन्नों में क्रांतिकारियों की महान विजय के रूप में दर्ज हुई।
📰 दामोदर स्वरूप सेठ ने देश भर के समाचार पत्रों तक पहुंचाई थी क्रांति की गूंज
महान स्वाधीनता सेनानी दामोदर स्वरूप सेठ का नाम भी बरेली के इस क्रांतिकारी अध्याय से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
वरिष्ठ साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बरेली: एक कोलाज’ में उनके अविस्मरणीय योगदान का विशद उल्लेख किया है। दामोदर स्वरूप सेठ ने जेल के भीतर चल रही भूख हड़ताल और अंग्रेजों के अत्याचारों से जुड़ी गुप्त जानकारियों को राष्ट्रीय समाचार पत्रों के माध्यम से देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में अग्रणी भूमिका निभाई थी। बनारस षड्यंत्र केस और काकोरी कांड जैसे आंदोलनों से सक्रिय रूप से जुड़े सेठ जी ने अंग्रेजी हुकूमत की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध जन-जागरण का कार्य अनवरत जारी रखा।
🏛️ पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर यशपाल और गढ़वाली तक, कई महान नायकों की कर्मस्थली रही यह जेल
बरेली सेंट्रल जेल का परिसर देश के कई शीर्ष स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और यातनाओं का साक्षी रहा है।
इस ऐतिहासिक जेल में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रख्यात वामपंथी विचारक एमएन राय, महान साहित्यकार यशपाल, पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, बंगाल के क्रांतिकारी गणेश घोष, विष्णुशरण दुबलिश तथा बनारस षड्यंत्र केस में गिरफ्तार अमर शहीद प्रताप सिंह बारहट जैसे अमर नायकों को बंद रखा गया था। इन महान सपूतों के संघर्ष और अदम्य हौसले की गवाही देती यह जेल आज की युवा पीढ़ी को स्मरण कराती है कि हमारी स्वतंत्रता अनगिनत बलिदानों का प्रतिफल है।