Supreme Court on TMC Freeze Order: ‘शिवसेना जैसा न हो हाल’, TMC सिंबल मामले पर बोले CJI सूर्यकांत- आयोग तय करे समयसीमा
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और आधिकारिक चुनाव चिन्ह (जोड़ा फूल) को फ्रीज किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से स्पष्ट पूछा कि वह दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस संगठनात्मक विवाद का अंतिम निपटारा कितने समय के भीतर कर सकता है। इसके साथ ही, बेंच ने ‘शिवसेना’ मामले जैसे लंबे विलंब से बचने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उल्लेखनीय है कि टीएमसी में अंदरूनी खींचतान और प्रतिद्वंद्वी दावों के बाद चुनाव आयोग ने आगामी 6 अक्टूबर के उपचुनावों के दृष्टिगत अंतरिम आदेश जारी कर मूल नाम और सिंबल के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिन्ह आवंटित किया था, जबकि अरूप रॉय (ऋतब्रत बनर्जी) गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह दिया था। चुनाव आयोग ने इसे अस्थाई व्यवस्था बताया था, लेकिन ममता बनर्जी ने इसे चुनौती देते हुए पार्टी की मूल पहचान की बहाली के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
⚖️ उपचुनाव के बीच सिंबल फ्रीज करने पर उठाए सवाल: कपिल सिब्बल बोले- ‘मेरे पास अब कोई विकल्प नहीं’
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की।
ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोरदार दलील रखते हुए सवाल उठाया कि जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा उपचुनाव का कार्यक्रम (नोटिफिकेशन) जारी हो चुका था, तब चुनाव आयोग ने अचानक मूल नाम और सिंबल को फ्रीज करने का आदेश क्यों जारी किया। सिब्बल ने कहा, “हमारी तरफ से जुलाई में ही जवाब दाखिल कर दिया गया था, फिर भी उपचुनाव की प्रक्रिया के बीच ऐसा कदम उठाया गया। अब मेरे पास कोई त्वरित कानूनी उपचार नहीं बचा है। हालांकि मैं उपचुनाव रोकने की मांग नहीं कर रहा हूँ, लेकिन इस तरह की व्यवस्था से गलत परंपरा शुरू होगी।”
🛡️ आयोग का आदेश अंतरिम है, अंतिम फैसला नहीं: CJI सूर्यकांत की टिप्पणी
कपिल सिब्बल की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का यह आदेश एक अंतरिम (अस्थाई) व्यवस्था है, अंतिम निर्णय नहीं।
पीठ के सदस्य जस्टिस बागची ने भी कहा कि आयोग ने यह अंतरिम कदम चुनाव के दौरान दोनों पक्षों को समान अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से उठाया है। सिब्बल ने जब इस पर चिंता जताई तो CJI ने कहा, “आदेश सही या गलत हो सकता है, लेकिन यह अंतिम फैसला नहीं है। हमें अंतिम निर्णय आने के बाद ही आगे की कानूनी स्थिति पर विचार करना होगा।”
⏳ ‘शिवसेना मामले में हुई देरी का नतीजा हम देख चुके हैं’: सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को दिए निर्देश
सुनवाई के दौरान जस्टिस जोयमाल्या बागची ने मामलों के लंबा खींचने पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, “हमने देखा है कि महाराष्ट्र के शिवसेना मामले में अत्यधिक देरी होने का क्या नतीजा हुआ था। इसलिए इस तरह के विवादों का शीघ्र समाधान होना बेहद जरूरी है।”
कपिल सिब्बल ने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को निर्देश दे कि वह अक्टूबर महीने के भीतर ही इस विवाद का अंतिम निपटारा करे। हालांकि, बागी गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि साक्ष्यों की जांच के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील से कहा कि वे आयोग से स्पष्ट निर्देश लें और बताएं कि अंतिम फैसला लेने में कितना समय लगेगा। अब इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार (28 सितंबर) को होगी।