Productivity vs Equality: पीरियड लीव महिलाओं के लिए ‘हक’ है या करियर में ‘रुकावट’? जानें क्या कहते हैं चौंकाने वाले आंकड़े

महिलाओं को पीरियड्स लीव मिलनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर चलने वाली बहस लंबी और पुरानी है. मगर इस बार ये 13 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से खारिज की गई एक याचिका के बाद फिर से चर्चा में है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच ने कहा कि पीरियड्स के लिए अनिवार्य पेड लीव से युवा महिलाओं को यह लगने लगेगा कि वे अपने पुरुष सहकर्मियों के बराबर नहीं हैं. कोर्ट ने कहा कि ये उनके विकास के लिए सही नहीं होगा और बाधा की तरह होगा.

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अगर वे महिलाओं के लिए ऐसा कोई कानून बनाते हैं तो कोई भी महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखेगा. ऐसे में उनके करियर और ग्रोथ के लिहाज से सही नहीं होगा. कोर्ट ने कहा कि पेड लीव से महिलाओं और पुरुषों के लिए समानता की विचारधारा पर असर पडे़गा और ये रुढ़िवादिता को बढ़ावा देगा. इस याचिका को एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की तरफ से दायर किया गया था. इस याचिका में उन्होंने पीरियड्स लीव के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की थी.

प्रोडक्टिविटी vs इक्वालिटी में छिड़ी बहस

अब पीरियड्स लीव पर देश की सर्वोच्च अदालत की तरफ से आई इस प्रतिक्रिया के बाद कुछ लोग इसे समानता (इक्वालिटी) के लिहाज से बेहतर बता रहे हैं तो वहीं कुछ का कहना है कि पीरियड्स के दिनों में भले ही महिलाओं को काम पर बुलाया जाए, लेकिन दर्द, मूड स्विंग, उल्टी, चक्कर आना, पेट में मरोड़ वाले दर्द की स्थिति में उनके काम के उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) क्या आम दिनों के बराबर होगी? ऐसे में सवाल उठाए गए कि उन्हें लीव देकर कुछ रेस्ट के बाद दफ्तर पर काम के लिए बुलाना बेहतर होगा या फिर इस तरह के हालात में उन्हें और काम का स्ट्रेस देना कितना बेहतर होगा?

भारत के इन राज्यों में मिलती है पीरियड्स लीव

भारत में राष्ट्रीय स्तर पर पीरियड्स लीव को लेकर कोई कानून भले ही नहीं है, लेकिन कुछ राज्यों की महिलाओं को इन दिनों में सहूलियत दी जाती है. दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में 18-52 साल की महिलाएं हर महीने वेतन सहित एक दिन का पीरियड्स लीव ले सकती हैं. ये नियम यहां की सभी प्राइवेट और सरकारी दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं के लिए है. मौजूदा समय में दुनिया की कुछ सबसे बड़ी IT कंपनियां भी इसी राज्य में हैं.

बिहार इस दिशा में सबसे पहला राज्य रहा, जिसने 1992 से ही महिलाओं को पीरियड्स लीव देना शुरु कर चुका था, लेकिन इस राज्य में ये सुविधा सिर्फ सरकारी दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं को है. ओडिशा में भी 55 साल तक की महिलाओं को एक दिन की पेड पीरियड्स लीव सरकारी और प्राइवेट दोनों कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं को दी जाती है. केरल विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली स्टूडेंट्स को भी पीरियड्स लीव दी जाती है.

सिक्किम हाई कोर्ट भारत का एकमात्र ऐसा हाई कोर्ट है जिसने अपनी महिला कर्मचारियों के लिए पेड पीरियड्स लीव की नीति लागू की है. भारत में Zomato में काम करने वाली महिलाओं को सालाना 10 दिन की पेड पीरियड्स लीव, BYJU’S में महिलाओं को सालाना 12 दिन की लीव दी जाती है.

महिलाओं का काम क्यों हो सकता है प्रभावित?

पीरियड्स के दिनों में कुछ महिलाओं को असहनीय दर्द होता है, जिसके मेडिकल शब्द डिसमेनोरिया (Dysmenorrhea) के नाम से जाना जाता है.ये पीरियड्स के शुरुआती दिनों में ज्यादातर देखा जाता है, जिसमें पीरियड्स के दिनों में महिलाओं की गर्भाशय की मांसपेशियों को तेजी से सिकोड़ती है. ये सिकुड़न प्रोस्टाग्लैंडिन्स नाम के रासायनों की वजह से होता है. इसके लक्षणों की तौर पर निचले पेट में तेज क्रैम्प्स, पीठ, कमर, जांघों, सिर में तेज दर्द होना. इसके साथ ही कुछ महिलाओं में उल्टी, दस्त, चक्कर आदि की समस्या भी पाई जाती है. अगर वो इन दिनों में आराम के बाद दफ्तर आती हैं तो फ्रेश मूड से उनके काम को बेहतर तरीके से कर सकती हैं.

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में दायर की गई एक याचिका( Dr. Jaya Thakur vs. Government of India & Ors.) में कोर्ट की तरफ से एक स्टडी का जिक्र किया गया जिसमें बताया गया कि लगभग 500 स्टूडेंट्स में से 29.2 प्रतिशत पार्टिसिपेंट्स के पीरियड्स के दौरान स्कूल से एब्सेंट रहने की रिपोर्ट मिली. यहां एब्सेंट रहने के बताए गए कारणों में डिसमेनोरिया सबसे आम था. ये याचिका स्कूलों में लड़कियों के लिए फ्री सैनिटरी पैड्स और अलग लड़कियों के टॉयलेट की मांग को लेकर दायर की गई थी.

नीदरलैंड की स्टडी

सीएनएन में प्रकाशित एक लेख में एक स्टडी का जिक्र किया गया है. नीदरलैंड (रैडबौड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर) की महिलाओं पर की गई एक स्टडी के मुताबिक, 80% महिलाओं में डिसमेनोरिया की समस्या पाई गई है. इस स्टडी का टॉपिक-‘मासिक धर्म से संबंधित लक्षणों के कारण उत्पादकता में कमी’ रहा. यहां की 80.7% महिलाओं ने पीरियड्स के दौरान प्रेजेंटिज्म यानी काम पर रहते हुए प्रोडक्टिविटी को कम होना) रिपोर्ट किया. ऐसे में औसत 8.9 दिन प्रति वर्ष प्रेजेंटिज्म के कारण उत्पादकता में कमी आई है.

ऐसे में महिलाओं की समस्या और दर्द को नकारना शायद सही नहीं है. जाहिर है इक्वेलिटी का ख्याल रखने के साथ-साथ काम के प्रोडक्टिविटी पर भी गौर करना जरूरी है. दर्द के दिनों में दफ्तरों महिलाओं की भीड़ तो नजर आएगी, लेकिन मासिक धर्म की पीड़ा की जद्दोजहद में शायद वो अपने काम में पूरा मन न लगा पाएं. ऐसे में महिला इन दिनों में लीव लेना चाहती है या नहीं इसकी निर्भरता और स्वतंत्रता उसे दी जानी चाहिए.

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Pradesh Samna
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