Narayanpur News: कोर्ट के आदेश पर मानसिक विक्षिप्त युवक को भेजा गया सेंदरी अस्पताल, जानें पूरा मामला
नारायणपुर: एक मां की अपील पर न्यायालय ने संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए मानसिक रूप से पीड़ित युवक के बेहतर इलाज का आदेश दिया.
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय ने डीएनके कॉलोनी निवासी 30 वर्षीय तपन राय को राज्य मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सालय सेंदरी, जिला बिलासपुर में उपचार के लिए भेजे जाने का आदेश दिया है. कोर्ट के फैसले पर बुजुर्ग मां ने खुशी जाहिर की. बुजुर्ग मां चाहती है कि उसका बेटा ठीक हो जाए.
कोर्ट से बुजुर्ग मां ने लगाई थी गुहार
दरअसल, न्यायालय के समक्ष युवक की मां भारती राय ने आवेदन प्रस्तुत कर अपने पुत्र की मानसिक स्थिति और इलाज में असमर्थता की जानकारी दी थी. आवेदन में बताया गया कि तपन राय मानसिक रूप से विक्षिप्त है और उसका व्यवहार स्वयं के साथ-साथ समाज के लिए भी जोखिमपूर्ण होता जा रहा है. परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उचित और निरंतर उपचार संभव नहीं हो पा रहा. न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उपलब्ध दस्तावेजों, परिस्थितियों और मां की अपील पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया और युवक को राज्य मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सालय सेंदरी, जिला बिलासपुर में भर्ती कर उपचार कराने का आदेश पारित किया.
बिजली के पोल पर चढ़ गया था युवक
गौरतलब है कि तपन राय वही युवक है जिसने 1 फरवरी को नारायणपुर के गौरव पथ मार्ग में एक बिजली के खंभे पर चढ़ गया था. इस दौरान एहतियात के तौर पर संबंधित क्षेत्र की बिजली आपूर्ति बंद कर दी गई थी. इक्ट्ठा भीड़ के कारण नारायणपुर के गौरव पथ मार्ग में कई घंटों तक यातायात व्यवस्था प्रभावित रही.
पुलिस और नगर पालिका प्रशासन ने संयम और सतर्कता के साथ संयुक्त प्रयास करते हुए युवक को लगातार समझाइश दी, ताकि वह कोई आत्मघाती कदम न उठाए. कई घंटों की मशक्कत के बाद युवक को सुरक्षित रूप से बिजली के खंभे से नीचे उतारा गया और तत्काल उपचार के लिए जिला अस्पताल भेजा गया.
मां ने खटखटाया था कोर्ट का दरवाजा
इस घटना के बाद युवक की मां भारती राय ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए अपने बेटे के स्थायी मानसिक उपचार की गुहार लगाई थी. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का यह आदेश न केवल कानून बल्कि मानवीय संवेदनाओं की मिसाल भी है. मानसिक रूप से पीड़ित युवक को उचित उपचार उपलब्ध कराना, उसके जीवन की सुरक्षा और समाज की भलाई दोनों के लिए आवश्यक माना गया है. न्यायालय के इस फैसले से न केवल एक मां को राहत मिली है, बल्कि यह संदेश भी गया है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और सहानुभूति सर्वोपरि है
