सूरत में इस बार गोबर से बनी लकड़ियों की जलेगी इको फ्रैंडली होली

सूरत। पिछले दो साल से दुनिया में फैली कोरोना महामारी के कारण रंगों का होली त्योहार फीके ढंग के मनाया गया था। अब पूरी दुनिया में कोरोना महामारी की रफ्तार कम हुई है तो देश में खुलकर होली मनाने को लेकर उत्साह बढ़ा है। होली के दिन केवल प्राकृतिक रंगों से ही होली खेलने की सलाह लंबे समय से दी जाती रही है। जबकि होलिका के दिन लकड़ियों नहीं जलाकर पेड़ों को बचाने का विचार शायद ही किसी के मन में आता है। अब सूरत में एक ट्रस्ट ने इस बार गोबर से बनी लकड़ियों की इको फ्रैंडली होलिका जलाने का फैसला किया है। पर्यावरण के अनुकूल होली के साथ ही प्राकृतिक होलिका को भी बढ़ावा देने के उद्देश्य से सूरत का पंजारापोल ट्रस्ट लकड़ी की जगह गाय के गोबर से बनी लकड़ियों से होलिका दहन करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए ट्रस्ट ने गाय के गोबर से लकड़ियों को बनाने का काम शुरू कर दिया है। पंजारापोल ट्रस्ट महाप्रबंधक अतुल ने कहा कि यह प्रदूषण को कम करने और वनों की कटाई को रोकने में मदद करेगा। परंपरागत रूप से पहले भी होलिका दहन के लिए गोबर के कंडों का भी इस्तेमाल किया जाता ही था।
सूरत में पंजारापोल ट्रस्ट होलिका में उपयोग करने के लिए गोबर की जो लकड़ियां बना रहा है वो अब तेजी से पारंपरिक लकड़ी की जगह ले रही है। ट्रस्ट के अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने सोचा कि अगर पर्यावरण को बचाना है और गायों के लिए कुछ करना है तो उसके लिए गाय के गोबर की लकड़ियां बनानी होंगी। जिसका उपयोग हर तरह के काम में लकड़ी की जगह किया जा सके। गौरतलब है कि गाय के गोबर से लकड़ियों को बनाने का काम कई गौशालाओं में तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। प्रयागराज और ग्वालियर जैसे शहरों में तो कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान मृतकों के दाह संस्कार के लिए भी गाय के गोबर से बनी लकड़ियों का खूब इस्तेमाल किया गया। गाय के गोबर से बनी ये लकड़ी पेड़ों की कटाई को कम करके जहां पर्यावरण को संरक्षित करने में योगदान देती हैं, वहीं इससे हासिल आमदनी से उन गायों को भी पालने में मदद मिलती है, जो दूध नहीं देती हैं।

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