Sandipani School Bus Crisis: ग्वालियर-चंबल में सांदीपनि स्कूलों की बस सेवा ठप! 2.5 महीने बीते, 512 रूट पर बच्चे परेशान
ग्वालियर। मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत शुरू किए गए सांदीपनि स्कूलों में छात्रों के आवागमन के लिए वाहन सेवा का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए ढाई महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन ग्वालियर-चंबल अंचल सहित प्रदेश के कई जिलों में विद्यार्थियों को घर से स्कूल लाने और वापस ले जाने के लिए बस सेवा अब तक शुरू नहीं हो सकी है। इसके कारण हर दिन सैकड़ों विद्यार्थियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
🛑 बस ऑपरेटरों को राजी करने में नाकाम अफसर: आयुक्त के सख्त निर्देशों का भी नहीं दिख रहा असर
हाल ही में आयुक्त लोक शिक्षण ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे जिला स्तर पर ही वैकल्पिक व्यवस्था बनाएं और स्थानीय बस ऑपरेटरों के साथ समन्वय स्थापित कर जल्द से जल्द बस संचालन शुरू कराएं।
इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर जिला शिक्षा अधिकारी बस ऑपरेटरों को राजी करने और दरों पर सहमति बनाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं, जिससे योजना का क्रियान्वयन अटका हुआ है।
🗺️ 512 रूटों पर चलनी हैं स्कूल बसें: ग्वालियर संभाग के 8 जिलों का बुरा हाल
ग्वालियर शिक्षा संभाग के अंतर्गत कुल आठ जिले आते हैं। इनमें ग्वालियर में 8, मुरैना में 8, भिंड में 7, शिवपुरी में 8, श्योपुर में 3, दतिया में 4, गुना में 6 और अशोक नगर में 3 सांदीपनि स्कूल संचालित हैं।
इन सभी स्कूलों के विद्यार्थियों को परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने के लिए करीब 512 रूट निर्धारित किए गए हैं, जिन पर बसों का संचालन किया जाना है। लेकिन जमीनी स्तर पर तालमेल की कमी के कारण एक भी रूट पर सुचारू व्यवस्था नहीं बन सकी है।
🎒 प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों के मर्जर से बढ़ा संकट: 15 किमी दूर से कैसे आएं मासूम बच्चे?
वाहनों की व्यवस्था न होने से सबसे बड़ी परेशानी ग्रामीण अंचलों के छोटे-छोटे बच्चों को हो रही है। दरअसल, शिक्षा विभाग ने सांदीपनि स्कूलों के 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी स्कूलों को इनमें मर्ज (विलय) कर दिया है।
पुराने स्थानीय स्कूल बंद होने के कारण 10 से 15 किलोमीटर दूर गांवों में रहने वाले छोटे बच्चों के सामने रोजाना स्कूल पहुंचने की गंभीर चुनौती पैदा हो गई है। गरीब और किसान परिवारों के लिए ऑटो या निजी वाहनों का दैनिक खर्च उठाना आर्थिक रूप से संभव नहीं हो पा रहा है।