Indore News: अस्पताल का भवन नहीं, फिर भी सालों से हो रहे तबादले! खजराना सिविल अस्पताल का अजीबोगरीब मामला
इंदौर के खजराना क्षेत्र में सरकारी व्यवस्था का एक ऐसा मामला सामने आया है, जो किसी मजाक से कम नहीं है। 23 जून 2020 को राज्य सरकार ने खजराना में 100 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल को मंजूरी दी थी, लेकिन 6 साल बीत जाने के बाद भी न तो अस्पताल के लिए जमीन आवंटित हो सकी और न ही एक ईंट रखी गई। हैरानी की बात यह है कि बिना भवन के ही इस अस्पताल के नाम पर 87 पद स्वीकृत कर दिए गए और वर्षों से कर्मचारियों की पोस्टिंग व तबादले धड़ल्ले से किए जा रहे हैं।
📝 अस्तित्व में नहीं, फिर भी हो रही ‘पोस्टिंग’
यह प्रशासनिक लापरवाही का चरम है कि अस्पताल अस्तित्व में न होने के बावजूद 15 जून 2026 तक लैब टेक्नीशियन जैसे पदों पर पोस्टिंग की जा रही है। चूँकि खजराना में भवन नहीं है, इसलिए स्वीकृत स्टाफ को पीसी सेठी अस्पताल, हुकुमचंद अस्पताल और अन्य केंद्रों पर सेवाएं देने के लिए भेजा जा रहा है। इस क्षेत्र की तीन लाख से अधिक आबादी आज भी इलाज के लिए एमवाय और जिला अस्पताल की लंबी लाइनों में खड़ी होने को मजबूर है।
🗣️ क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी?
उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला का कहना है कि पद पोर्टल पर दिखते हैं, इसलिए उन्हें सीएमएचओ द्वारा आसपास के संजीवनी क्लीनिक में एडजस्ट कर दिया जाता है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव हसानी ने स्वीकार किया कि शहरी क्षेत्र में सरकारी जमीन न मिलने के कारण निर्माण रुका हुआ है, और फिलहाल इन स्वीकृत कर्मचारियों का उपयोग अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर किया जा रहा है।
⚖️ विपक्ष ने लगाया बड़े घोटाले का आरोप
कांग्रेस ने इसे एक बड़ा घोटाला करार दिया है। पूर्व मंत्री पीसी शर्मा का आरोप है कि जिस संस्थान का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है, उसके नाम पर नियुक्तियां और तबादले करना गंभीर अनियमितता है। उन्होंने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। स्थानीय नागरिक भी इस व्यवस्था से खासे नाराज हैं, जिनका कहना है कि कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय सरकार को जमीन तलाश कर अस्पताल का निर्माण पूरा करना चाहिए था।